:आलोक वर्मा :
:हिन्दी दिवस:
जो लोग हिन्दी दिवस का मज़ाक उड़ा रहे हैं उनसे मेरी अपील है कि ऐसा न करें। हमारे देश में पहले उर्दू,अरबी और फारसी भाषा में राजकीय कार्य किया जाता रहा है और अंग्रेज़ों के आने के बाद इसमें अंग्रेजी भी जुड़ गई किंतु हिन्दी भाषा को आज़ादी के बाद जवाहर लाल नेहरू जी ने राजकीय भाषा बनाने का प्रयास किया पर अन्य क्षेत्रीय भाषाई प्रांतों के विरोध के कारण यह कार्य धीमी गति से हुआ। हरिवंश राय बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा में इसके विषय में जानकारी दी है। जैसे विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय आदि के हिंदी में नामकरण को लेकर उहापोह को लेकर उन्होंने रोचक वर्णन किया है।
फेसबुक पर कल से बहुत से मित्रों की वाल पर मैंने कुछ इसी तरह की पोस्ट देखी तो मुझे लगा कि शायद लोगों को जानकारी न होने से ऐसा हो रहा है।
अपने प्रिय लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के लेखकीय में मैंने पढ़ा है कि आज़ादी के बाद पंजाबी जो लाहौर आदि जगहों से दिल्ली आए तो रामलीला का मंचन हुआ उनके पात्र हिंदी के संवाद को पंजाबी टोन में बोलते थे किन्तु पढ़ उर्दू ही सकते थे पत्र भी उर्दू में लिखते थे तात्पर्य यह है कि विस्थापित पंजाबी बोलते पंजाबी थे किन्तु लिख नहीं सकते थे और लिखते उर्दू थे किन्तु बोल नहीं सकते थे और हिन्दी तो कहीं थी ही नही।
आलोक वर्मा
16.9.2020
No comments:
Post a Comment