Friday, March 27, 2020

हेरोइन

सोलंकी सुबह अपने बॉस गणेश केलकर के हुजूर में पहुँचा। बॉस का मूड उसे कुछ उखड़ा सा लगा। उसने अभिवादन किया बॉस केलकर ने एक फिसलती नजर उस पर डाली फिर अपनी मेड से बोला -- " शांति, एक ऑमलेट और चाय ला देना और हाँ ऑमलेट फ्रेंच लाना,सोलंकी तू भी कुछ लेगा"। 
उसने सोलंकी से पूछा तो वह अचकचा गया फिर सोलंकी हड़बड़ाकर बोला-- " नही। मैं नाश्ता करके आया"। बॉस ने उसकी तरफ़ देखा। 
" चाय। चाय लूंगा मैं" -- सोलंकी शांति से बोला।
" हम्म"-- बॉस केलकर ने कहा और सोलंकी से पूछा " माल की क्या पोजीशन है"
यही वो सवाल था जिससे सोलंकी की गले की घण्टी जोर से उछली। 
" अभी पता नही चला"-- कहकर वह नीचे देखने लगा।
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मनीष गुप्ता सीएसटी स्टेशन पर उतरा और वही से उसने टैक्सी की। 
" नरीमन" टैक्सी ड्राइवर से उसने कहा।
टैक्सी ड्राइवर ने मीटर डाउन किया और टैक्सी को गियर में डाला।
नरीमन पॉइंट मुम्बई की शानदार जगह थी। सामने विशाल समुद्र।पीछे ऊँची बिल्डिंगे। सैलानियों की भीड़ लगी रहती थी। शाम का वक्त हो चला था । सन सेट के समय काफी भीड़ हो जाती थी।
आशी ने उससे वही मिलने को कहा था। आशी  उसकी गर्लफ्रेंड थी जो एक अमीर ज्वेलर की बेटी थी और अपना बुटीक चलाती थी।
तभी मनीष का सेल फोन बजा।उसने देखा आशी लाइन पर थी।
" हां" उसने कहा।
" पहुँच गए" आशी ने पूछा।
" बस अभी पहुँचा" मनीष बोला।
"ओके, आती हूँ।" आशी बोली।
" ओके " मनीष ने कहा और फोन काट दिया।
मनीष किनारे बैठ गया और एक सिगरेट सुलगा ली। मनीष यूपी के बनारस के रहने वाला था मुम्बई में किसी मल्टी नेशनल कम्पनी में नौकरी करता था। अभी शादी नही की थी। एक दिन किसी पार्टी में आशी उससे मिली। दोनो एक दूसरे को पसंद करने लगे। वे कब एक दूसरे के बेहद करीब आ गये उन्हें पता न चला।
" मनीष"  उसने देखा आशी आ रही थी।
उसने मुस्कुरा कर हाथ हिलाया।
मनीष की नौकरी उसका फ्रंट थी असल मे गणेश केलकर नाम के लोकल मवाली के ड्रग्स डिवीजन का इंचार्ज था। इस समय मनीष परेशान था क्योंकि नेपाल के रास्ते आई हिरोइन की एक बड़ी खेप उसके प्रतिद्वंदी गिरोह में से किसी ने लूट लिया था और माल का पता नही चल रहा था। आज सुबह सोलंकी बॉस गणेश केलकर से मिल कर आया था बॉस ने दो दिन का वक्त दिया था। 
मनीष इन सबसे बहुत टेंशन में था इसीलिये वह आशी से मिलने आया था।
"क्या बात है? आज मूड में नही हो" --आशी ने पूछा।
" कुछ काम की टेंशन है। कुछ खास नही। तुम बताओ,सटरडे को अलीबाग का प्रोग्राम पक्का है न " उसने कहा।
" कल फाइनल हो जायेगा। मेरी कल दोस्तों से बात होगी।'-- आशी बोली।
मनीष ने बेहद अनुराग से उसे देखा। कितनी निश्चल,कितनी मासूम है मुम्बई जैसे शहर में रहते हुये भी बेहद मासूम थी। मासूम थी पर बेवकूफ नही थी एक न एक दिन उसके बारे में में सब जान लेगी। सोचकर वो घबरा गया।
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गणेश केलकर कोलाबा के अपने आलीशान ऑफिस में अपनी शानदार विलायती कुर्सी पर बैठा था और सामने उसके मैनेजर थे। केलकर अपने धन्धों को कारपोरेट की तर्ज पर चलाता था। वह एक बहुमंजिला नई बनी इमारत थी जिसके टॉप फ्लोर पर उसका ऑफिस था। अन्य फ्लोर पर विभिन्न कम्पनियों के ऑफिस थे। केलकर का 5 करोड़ की हिरोइन किसी ने लूट ली थी इसीलिये यह मीटिंग बुलाई गई थी। सोलंकी और मनीष के अलावा आबिद, नरेश, इमरान,सुल्तान और केलकर का साला विनय पाराशर भी मौजूद था।
" सोलंकी, माल का पता कैसे चलेगा। वो कौन लोग थे? कौनसा गिरोह था जिसने हमारा माल लुटा"  केलकर बोला।
" बॉस, हमारी कोशिश जारी है। हमारे भेदिये खोज कर रहे है"-- सोलंकी मरे हुए स्वर में बोला।
" 5 करोड़ का माल था। पार कर दिया हरामजादों ने और कोई सुराग भी नही मिल रहा है। वो लड़की, वो हमारी कूरियर, एयर होस्टेस क्या बोल रही है।" केलकर ने शांत स्वर में कहा। केलकर कभी गुस्सा नही करता था पर उसके दबदबे में कोई कमी न थी।
" वो जब एयरपोर्ट से बाहर निकली तभी दो लड़कों ने उसका बैग छीन लिया था । सीसी टीवी में भी आया और कई लोगों ने देखा भी।" सोलंकी बोला।
" हम्म, कल इस लड़की को बुलाओ। मेरे को मिलना है इससे।"  केलकर बोला और मीटिंग बर्खास्त कर दी।
हम्म केलकर का तकिया कलाम था।
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रैडिसन ब्लू रिजॉर्ट & स्पा कर्जत में मनीष गुप्ता सोलंकी के साथ मौजूद था। वहाँ उनकी एक नए ड्रग सप्लायर से मीटिंग थी। ये नया सप्लायर उन्हें आधे दामों पर माल मुहैया करा सकता था। उसका म्यांमार, लाओस में कांटेक्ट था। हबीब खान सप्लायर का नाम था। अभी। वह वहाँ नही पहुँचा था। वक्त काटने के लिए वो सोलंकी के साथ चियर्स कर रहा था। 
तभी काल बेल बजी।सोलंकी ने दरवाजा खोला। सामने हबीब खान खड़ा था। सोलंकी किनारे हुआ और बोला" वेलकम"
दोनों ने हाथ मिलाये मनीष भी उठकर खड़ा हो गया उसने भी हाथ मिलाया।
" कोई दिक्कत तो नही हुई।"-- मनीष बोला।
"नही, कोई दिक्कत नही हुई"-- हबीब ने कहा।
"आपके माल का पता लगा"-- उसने पूछा।
" नही अभी पता नही लगा।"-- मनीष ने कहा।
" खबर है कि अन्ना के गैंग का काम है"-- हबीब ने कहा।
"अरे,किसने कहा"-- मनीष ने पूछा।
" कुछ लोग सस्ते दाम पर माल बेचने की फिराक मे है, अन्ना के आदमी है वो मुझे पता लगा" हबीब बोला।
" ओह" सोलंकी ने कहा।
" आप हमें माल की सप्लाई कहाँ देगें" मनीष ने पूछा।
" मुम्बई" हबीब ने कहा।
" माल की पेमेंट 50 % एडवांस में देना होगा" -- हबीब ने कहा।
" ओके" -- मनीष ने कहा।
"ठीक है"-- मैं निकलता हूं हबीब ने कहा।
" ठीक है फिर मिलते है। माल की कोई खबर लगे तो देना" -- मनीष ने हबीब से कहा।
"जरूर" -- हबीब ने कहा और बाहर निकल गया। सोलंकी उसे बाहर छोड़ने गया।
मनीष का सेलफोन बजा। उसने स्क्रीन पर निगाह डाली तो देखा शीला का फोन था। जरूर बॉस बात करना चाह रहा है। शीला बॉस की सेक्रेट्री थी। उसने काल रिसीव की" हलो" बहुत संभलकर उसने बोला।
" मीटिंग हो गई"-- केलकर लाइन पर था।
" जी बॉस"-- उसने कहा।
" माल का पता चल गया है। तुम लोग अंधेरी आना। मैं उधर ही मिलूंगा।"-- केलकर बोला।
" ठीक है बॉस। मैं भी यहाँ से निकल रहा हूँ" -- मनीष ने कहा।
"ओके" केलकर बोला और फोन काट दिया।
सोलंकी वापस आया। मनीष ने कहा" बॉस का फोन आया था। माल का पता चल गया है,अंधेरी बुलाया है।"
"वाह, किसने किया ये कमाल" सोलंकी बोला।
" पता नही। चलने की तैयारी कर। वहीं पहुंचकर पता चलेगा"-- मनीष बोला।
"बवाल बढ़ेगा" -- सोलंकी चिंतित स्वर में बोला।
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होटल चन्द्रलोक लोनावला में पोस्ट आफिस के पास ही था जहां इस घड़ी हबीब खान होटल के कमरे में मौजूद था। खान खांडेकर का इंतजार कर रहा था।हेमन्त खांडेकर 27 साल का था पर अपराध की दुनिया मे बहुत तेजी से अपना मुकाम बनाने में लगा था। उसके साथी गुड्डू खान,पावले,रशीद और देशमुख थे। ये पांचों हमेशा साथ रहते और मिलकर काम करते थे। वैसे सबका दर्जा बराबर का था और वे आपस में बहुत अच्छे दोस्त थे पर हेमंत का दर्जा खास था। मुसीबत की घड़ी में उसकी ही चलती थी और सब मानते थे।
" मैं खान से मिलने कू जा रहा। अगर कोई खतरा दिखे तो रिंग करने का"-- हेमन्त ने अपने साथियों को देखकर कहा। वे एक लाल पजेरो में सवार थे।
"ठीक है"-- देशमुख बोला।
" एक बात और गाड़ी को होटल से दूर ले जाने का। जब अपुन आयेगा तो रिंग करेगा"
" देशमुख गाड़ी ले जायेगा। बाकी हम सब इदरिच ही रुकेगा"  गुड्डू बोला।
" वो तुम लोग देखने का,पण एकदम अलर्ट रहने का। खतरा बहुत है"
"तू जा जाकर खान से मिल, जो होगा देखा जायेगा"-- देशमुख बोला।
"ओके" 
देशमुख ने गाड़ी ले जाकर होटल की मारकी में रोकी, हेमन्त उतरा उसके साथ गुड्डू,रशीद और पावले भी उतरे।
‌हेमन्त लिफ्ट में सवार हो गया पर रशीद, पावले और गुड्डू  रिसेप्शन पर ही रुक गए। देशमुख गाड़ी को बाहर ले गया।
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‌खांडेकर लिफ्ट से थर्ड फ्लोर के 305 नंबर कमरे के बाहर  पहुंचा। हकीकतन वो होटल का कमरा न होकर एक आलीशान सूट था। बड़े होटलों में बड़े लोगों में सूट का ज्यादा प्रचलन था। खांडेकर मुंबई की जरायम की दुनिया का नया उभरता सितारा था। डाक की स्मगलिंग से शुरू हुआ उसका सफर आज नारकोटिक्स की स्मगलिंग तक आ पहुंचा था। इब्राहीम मिर्ज़ा और अन्ना के गैंग से हुई उनकी हालिया जुगलबंदी ने उसके गैंग का हौसला इतना बढ़ा दिया था कि वे केलकर का माल लूटने का देख सके, देख सके क्या उसे पूरा भी के लिया। पांच करोड़ की लूटी हुई हेरोइन का सौदा करने के लिए ही वह खान से मिलने आया था।मीटिंग के लिए खान ने ही लोनावाला चुना था,कारण खान मुंबई से दूर रहना चाहता था,वह नहीं चाहता था कि एन सीबी के भेदियो की निगाह में आए।
खांडेकर ने कालबेल के पुश बटन पर अपनी उंगली रखी। जवाब में खान ने खुद दरवाजा खोला।
" आओ" उसने कहा और एक तरफ हट गया।
खांडेकर अंदर गया, खान ने उसे सोफे पर बैठने का इशारा किया और खुद भी एक सोफ़ा चेयर पर बैठ गया,कमरे में और कोई नहीं था।
"तो वो पांच करोड़ का केलकर का माल तुम्हारे साथियों ने लूटा है"
" हां,इसीलिए मै यहां हूं"
"पचास टका अभी दूंगा, बाकी पेमेंट दस दिन बाद"
" नो, उधार नहीं  हो पायेगा, पेमेंट एक बार में करनी होगी, वरना नक्की करो।"
" ओह, पर चार से ज्यादा नहीं दे सकता, खतरा बहुत है केलकर जान गया तो जान के लाले पड़ जायेंगे सो अलग"
" चार पचास से एक पैसा कम नहीं" खांडेकर खान की आंख में आंख डालकर बोला।
"चार पच्चीस, फाइनल ...."
खांडेकर कुछ देर सोचता रहा फिर बोला " डन"
" माल की डिलीवरी भी यहीं पर"
"ठीक है"
"परसों शाम सात बजे, खंडाला में"
"ओके" खांडेकर ने खान से हाथ मिलाया और सूट से बाहर निकला। 
रिशेप्सन पर खांडेकर के साथी उसका इंतजार कर रहे थे वे बाहर निकले और गाड़ी में सवार होकर निकल लिए।प्र वहां कोई और भी था जिसकी खांडेकर और उसके साथियों पर नजर थी।

#पांच_करोड़_की_ हेरोइन

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‌चार

" हमारा माल अन्ना और मिर्ज़ा के लड़कों ने लूटा है, उनसे माल वापस लेना है और सबक भी सिखाना है ताकि दोबारा कोई ऐसा करने के पहले सोचे"-  केलकर गुस्से में था।
" कौन है वो "- सोलंकी ने पूछना चाहा।
" कोई नवा लड़का है, खान से मिला माल बेचने को, कल खंडाला में सुपुर्दगी करेगा। तू अपनी टीम लेकर काबू कर।"
"तीन टीम बनाने का एक को तुम लीड करेगा, बाकी दो को आबिद और पाराशर लीड करेगा। कोई बच कर जाने पाये। मनीष तुम अन्ना और मिर्ज़ा दोनो में से किसी को हिट करने का इंतजाम कर, कोई भी नुकसान,बड़ा नुकसान इन दोनों का होते देखना चाहता मैं,जल्दी।"
" ठीक है बॉस"- 
वो सब अंधेरी में इम्पीरियल स्टूडियो के पास एक बिल्डिंग में बैठे थे। उस बिल्डिंग में एक डबिंग स्टूडियो भी था शायद वो भी केलकर की संपत्ति थी। केलकर का काफी पैसा फ़िल्मों में लगा हुआ था। उसका जीजा एक बड़ा नेता था और सरकार में रसूखदार मंत्री था। केलकर का जीजा अशोक दाभोलकर सार्वजनिक तौर पर केलकर से दूर रहता था पर उसके हर स्याह सफेद धंधे में शामिल था।

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विक्की देशलहरे 28 साल का था बचपन से उसे डॉन बनने का शौक था। फिल्मों का इतना जुनून था कि खुद को सलमान समझता था गाहे बगाहे अपने दोस्तों से भी कहता था दोस्त भी मजा लेते थे। आज उसकी जिंदगी का अहम दिन था। वो केलकर के गैंग में साल भर से था पर उसे कभी कोई ऐसा काम नही मिला जिससे वह अपना दबदबा बना सके और बॉस की निगाह में चढ़ सके।
आज उसे मौका मिला था कि वह खुद को साबित कर सके। मनीष ने उसे मिर्ज़ा को उड़ाने को बोला था। 
‌मिर्ज़ा बांद्रा ईस्ट में रहता था। वह एक कार में बैठा था उसके साथ राजू था जो कि इन मामलों में कार चलाने में एक्सपर्ट था। पीछे बाइक पर विक्टर और मिश्रा थे जो किसी दुश्वारी में बैकअप देते। विक्की को टेंशन हो रही थी उसने एक सिगरेट जला ली और इंतजार करने लगा। तभी एक कार आई जिसमे से मिर्ज़ा उतरा, उसके साथ दो लोग और थे। कार आगे चली गई मिर्ज़ा अपने साथियों के साथ बिल्डिंग की ओर बढ़ा तभी विक्की ने रायफल से गोली चलाई, मिर्ज़ा कटे पेड़ की तरह गिरा, विक्की ने फिर गोली चलाई जो मिर्ज़ा के सीने पर लगी। तभी मिर्ज़ा के साथियों ने गोली चलानी शुरू कर दी थी। विक्की सीट के नीचे छुप गया था,राजू ने कार भगा दी। कुछ दूर जाने पर राजू ने गाड़ी रोक दी। विक्की उतरा, पीछे से विक्टर बाइक से पहुँचा उसने मिश्रा को उतारा और विक्की को बिठाकर कर चल दिया।
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मिर्ज़ा की हत्या के बाद मुम्बई का अंडरवर्ल्ड सहमा सा था। एक गैंगवार की भूमिका तैयार थी। विभिन्न गिरोहों के आका भी अंदर से हिले हुये थे,ऊपर से कोई नही बोल रहा था पर अंदर से सबकी बजी पड़ी थी। जेके, जो कि ड्रग्स और बार का धन्धा करता था और पुराना डान था उसने समझौते की पेशकश की। अन्ना और केलकर से बात की और मामले को खत्म करने के लिए जुहू के एक होटल में मीटिंग फिक्स की थी।
केलकर कोलाबा में अपने साथियों के साथ मीटिंग कर रहा था।
" मैं मीटिंग में मनीष,सोलंकी और आबिद के साथ रहेगा बाकी लोग सबकी मूवमेंट को वाच करेंगे। अगर किसी को मौका लगे तो अन्ना को खत्म कर देना।"---- केलकर ने साथियों से कहा और सबके चेहरे को देखने लगा।
"आप रिस्क क्यों ले रहे हैं बॉस, ऐसी मीटिंग तो हम अटेंड कर सकते है,हो सकता है ये उनका कोई प्लान हो। अन्ना को कम आँकना ठीक नही "--- मनीष ने केलकर से कहा।
"हम्म"--- 
" ठीक है तू देख ले पराशर को साथ लेकर जाना। सोलंकी और आबिद को भी"
" और हा इस मामले को जल्दी निबटा"-- केलकर ने कहा।
"यस बॉस मैं देखता हूँ"-- मनीष बोला और मीटिंग खत्म हो गई।
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अलीबाग के बीच बहुत साफ सुथरे थे,वीकेंड में वहाँ मुंबई से काफी लोग आते थे। आशी मनीष के संग अलीबाग में आई हुई थी। बीच के किनारे छोटे छोटे खूबसूरत कॉटेज बने थे जो सभी आधुनिक सुविधाओं से युक्त थे। दोनो बीच के किनारे कुर्सियों पर लेटे बीयर चुसक रहे थे। मनीष अपने और आशी के भविष्य को लेकर सोच में था। कल की मीटिंग में एक बड़े खून खराबे को उसने रोक लिया था। खांडेकर और उसके साथियों को अपनी गैंग में शामिल करने की राय केलकर को पसंद आई थी।
ताकतवर की दोस्ती में अपनी ताकत है ये फंडा वो केलकर को समझाने में कामयाब रहा था। खांडेकर में उसे गैंग के लिए होशियार बन्दा दिखा था।
बास को अपना माल मिलने की खुशी थी। आज वह अलीबाग आया था।
"क्या सोच रहे हो"-- आशी बोली।
"तेरे बारे में"
"क्या"- वो मुस्कुराई।
"यही कि तू इतनी खूबसूरत और अमीर होकर एक बनारसी के चक्कर मे कैसे आ गई"
"धत्त" -- वो शरमाई, उसके गालों पर लाली छा गई।
"आशी मुझे तुमसे कुछ कहना है"--
"क्या, बोलो न"
"आज नही"
"फिर कब"
"बाद में"
"ठीक है"
इस तरह वे दोनों हँसते बोलते रहे।
तभी मनीष के सेलुलर की घन्टी बजी, उसने स्क्रीन पर निगाह डाली तो पाया सोलंकी लाइन पर था।
" आप कब लौटोगे, तिवारी मिलना चाहता है"
"रात को आ जाऊँगा, 11 बजे मीटिंग रख लो"
"ठीक है"
तिवारी एनसीबी का अधिकारी था जिसके माध्यम से उनको माल सप्लाई होता था। जो माल एनसीबी पकड़ती थी वो वह उनसे खरीद लेते थे फिर वही माल मार्केट में बेच देते थे। तिवारी की वजह से उनको बहुत सी लीड मिल जाती थी।
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Thursday, March 12, 2020

रंगी गुलिस्तां



ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा
अलविदा ऐ सरज़मीन-ए-सुबह-ए-खन्दां अलविदा
अलविदा ऐ किशवर-ए-शेर-ओ-शबिस्तां अलविदा
अलविदा ऐ जलवागाहे हुस्न-ए-जानां अलविदा

तेरे घर से एक ज़िन्दा लाश उठ जाने को है 
आ गले मिल लें कि आवाज़-ए-जरस आने को है
ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा

हाय क्या-क्या नेमतें मिली थीं मुझ को बेबहा
यह खामोशी यह खुले मैदान यह ठन्डी हवा
वाए, यह जां बख्श गुस्ताहाए रंगीं फ़िज़ां
मर के भी इनको न भूलेगा दिल-ए-दर्द आशना
मस्त कोयल जब दकन की वादियों में गायेगी
यह सुबह की छांव बगुलों की बहुत याद आएगी
ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा

कल से कौन इस बाग़ को रंगीं बनाने आएगा
कौन फूलों की हंसी पर मुस्कुराने आएगा
कौन इस सब्ज़े को सोते से जगाने आएगा
कौन जागेगा क़मर के नाज़ उठाने के लिये
चांदनी रात को ज़ानू पर सुलाने के लिये
ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा

आम के बाग़ों में जब बरसात होगी पुरखरोश
मेरी फ़ुरक़त में लहू रोएगी चश्मे मय फ़रामोश
रस की बूंदें जब उड़ा देंगी गुलिस्तानों के होश 
कुंज-ए-रंगीं में पुकारेंगी हवाएँ 'जोश जोश'
सुन के मेरा नाम मौसम ग़मज़दा हो जाएगा
एक महशर सा गुलिस्तां में बपा हो जाएगा
ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा

आ गले मिल लें खुदा हाफ़िज़ गुलिस्तान-ए-वतन
ऐ अमानीगंज के मैदान ऐ जान-ए-वतन
अलविदा ऐ लालाज़ार-ओ-सुम्बुलिस्तान-ए-वतन
अस्सलाम ऐ सोह्बत-ए-रंगीं-ए-यारान-ए-वतन
हश्र तक रहने न देना तुम दकन की खाक में 
दफ़न करना अपने शाएर को वतन की खाक में
ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा

जोश मलीहाबादी

Wednesday, March 11, 2020

मुहाजिर

Syed faraz की एक अमूल्य पोस्ट..

विभाजन के समय जो लोग हिंदोस्तान से पाकिस्तान चले गए, उनको वहाँ 'मुहाजिर'(शरणार्थी) कहा गया।
मुहाजिरों पर लखनऊ के सुविख्यात शायर मुनव्वर राना साहब ने लगभग साढ़े चार सौ अशआर पर आधारित एक लंबी ग़ज़ल 'मुहाजिरनामा' कही।
हालाँकि ये ग़ज़ल ख़ासतौर पर भारत-पाकिस्तान के बँटवारे से जुड़े मुहाजिरों के लिए लिखी गयी है, लेकिन दुनिया के दूसरे मुहाजिरों के लिए भी ये उतनी ही प्रासंगिक है।
इस ग़ज़ल के कुछ चुनिंदा अशआर देखें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियाँ दें।

मुहाजिर हैं, मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं
तुम्हारे पास जितना है, हम उतना छोड़ आए हैं
(मुहाजिर - शरणार्थी)

कहानी का ये हिस्सा आज तक सब से छुपाया है
कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं

कई दर्जन कबूतर तो हमारे पास ऐसे थे
जिन्हें पहना के हम चांदी का छल्ला छोड़ आए हैं

वो टीपू जिसकी क़ुर्बानी ने हमको सुर्ख़-रू रक्खा
उसी टीपू के बच्चों को अकेला छोड़ आए हैं
(टीपू - टीपू सुल्तान; सुर्ख़-रू - कामयाब/अच्छी हालत में)

नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में
पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं

अभी तक हमको मजनूँ कहके कुछ साथी बुलाते हैं
अभी तक याद है हमको कि लैला छोड़ आए हैं

'मियाँ' कह कर हमारा गाँव हमसे बात करता था
ज़रा सोचो तो हम भी कैसा ओहदा छोड़ आए हैं

वो इंजन के धुएँ से पेड़ का उतरा हुआ चेहरा
वो डिब्बे से लिपट कर सबको रोता छोड़ आए हैं

हमारा पालतू कुत्ता हमें पहुँचाने आया था
वो बैठा रो रहा था, उसको रोता छोड़ आए हैं

बिछड़ते वक़्त था दुश्वार उसका सामना करना
सो उसके नाम हम अपना संदेशा छोड़ आए हैं

बुरे लगते हैं शायद इसलिए ये सुरमई बादल
किसी की ज़ुल्फ़ को शानों पे बिखरा छोड़ आए हैं
(शाना - कन्धा)

कई होठों पे ख़ामोशी की पपड़ी जम गयी होगी
कई आँखों में हम अश्कों का पर्दा छोड़ आए हैं

बसी थी जिसमें ख़ुश्बू मेरी अम्मी की जवानी की
वो चादर छोड़ आए हैं, वो तकिया छोड़ आए हैं

किसी की आरज़ू के पाँवों में ज़ंजीर डाली थी
किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं

पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से
निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं

जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है
वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं
(उन्नाव - यूपी का एक ज़िला, मोहान - एक क़स्बा)
(नोट: यहाँ 'हसरत' शब्द महान उर्दू शायर, पत्रकार और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी 'हसरत मोहानी' के लिए इस्तेमाल किया गया है।)

यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद
हम अपना घर-गली, अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं

हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है
हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं

गले मिलती हुई नदियाँ, गले मिलते हुए मज़हब
इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं

वज़ू करने को जब भी बैठते हैं, याद आता है
कि हम जल्दी में जमना का किनारा छोड़ आए हैं
(वज़ू - नमाज़ पढ़ने से पहले मुँह-हाथ-पैर धोने की एक निश्चित और अनिवार्य प्रक्रिया; जमना - यमुना)

हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की
किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा, छोड़ आए हैं
(सेहरा - शादी के मौक़े पर दूल्हा और उसके घरवालों के बारे में नज़्म या ग़ज़ल के रूप में लिखा गया कलाम)

कई आँखें अभी तक ये शिकायत करती रहती हैं
कि हम बहते हुए काजल का दरिया छोड़ आए हैं

शकर इस जिस्म से खिलवाड़ करना कैसे छोड़ेगी
कि हम जामुन के पेड़ों को अकेला छोड़ आए हैं 

वो बरगद जिसके पेड़ों से महक आती थी फूलों की
उसी बरगद में एक हरियल का जोड़ा छोड़ आए हैं

अभी तक बारिशों में भीगते ही याद आता है
कि हम छप्पर के नीचे अपना छाता छोड़ आए हैं

भतीजी अब सलीक़े से दुपट्टा ओढ़ती होगी
वही झूले में हम जिसको हुमड़ता छोड़ आए हैं

ये हिजरत तो नहीं थी बुज़दिली शायद हमारी थी
कि हम बिस्तर में एक हड्डी का ढाँचा छोड़ आए हैं
(हिजरत - एक जगह से दूसरी जगह रहने के लिए जाना)

हमारी अहलिया तो आ गयी, माँ छुट गई आख़िर
कि हम पीतल उठा लाये हैं, सोना छोड़ आए हैं
(अहलिया - पत्नी)

महीनों तक तो अम्मी ख़्वाब में भी बुदबुदाती थीं
सुखाने के लिए छत पर पुदीना छोड़ आए हैं

वज़ारत भी हमारे वास्ते कम-मर्तबा होगी
हम अपनी माँ के हाथों में निवाला छोड़ आए हैं
(वज़ारत - मंत्रालय का पद; कम-मर्तबा - छोटे दर्जे की)

यहाँ आते हुए हर क़ीमती सामान ले आए
मगर इक़बाल का लिक्खा तराना छोड़ आए हैं

कल एक अमरुद वाले से ये कहना पड़ गया हमको
जहाँ से आये हैं हम इसकी बग़िया छोड़ आए हैं

वो हैरत से हमें तकता रहा कुछ देर, फिर बोला
वो संगम का इलाक़ा छुट गया या छोड़ आए हैं?
(नोट: संगम यानी इलाहाबाद के मीठे अमरूद बहुत मशहूर हैं।)

अभी हम सोच में गुम थे कि उससे क्या कहा जाए
हमारे आँसुओं ने राज़ खोला, 'छोड़ आए हैं'

गुज़रते वक़्त बाज़ारों में अब भी याद आता है
किसी को उसके कमरे में सँवरता छोड़ आए हैं

हमारा रास्ता तकते हुए पथरा गयी होंगी
वो आँखे जिनको हम खिड़की पे रक्खा छोड़ आए हैं

तू हमसे चाँद इतनी बेरुख़ी से बात करता है
हम अपनी झील में एक चाँद उतरा छोड़ आए हैं

ये दो कमरों का घर और ये सुलगती ज़िंदगी अपनी
वहाँ इतना बड़ा नौकर का कमरा छोड़ आए हैं

हमें मरने से पहले सबको ये ताकीद करनी है 
किसी को मत बता देना कि क्या-क्या छोड़ आए हैं
(ताकीद - नसीहत)

ग़ज़ल ये ना-मुक़म्मल ही रहेगी उम्र भर 'राना'
कि हम सरहद से पीछे इसका मक़्ता छोड़ आये हैं
(ना-मुकम्मल - अधूरी; मक़्ता - ग़ज़ल का आख़िरी शेर जिसमें शायर का तख़ल्लुस यानी उपनाम भी आता है)

Tuesday, March 10, 2020

असुर

*असुर*

हाइली रिकमंडेड सीरीज, रात की इस घड़ी रिव्यु लिखने की कोई तुक तो नहीं, पर मुझे एक वरदान है कि मैं किताब पढ़ के और मूवी देख के भूल जाता हूं, पर कभी जरूरत पड़ जाए तो उसे रिकवर भी कर लेता हूँ । आप कहेंगे इसमें वरदान क्या है ? ये तो आप भुलक्कड़ हुए महाराज । पर यही तो आनंद है, जब भी दुबारा पढ़ो या देखो, नया सा लगता है । ख़ैर मैं यहां आया हूँ वूट की वेबसीरीज असुर का रिव्यु आपके सामने रखने, तो साहबान काफी अच्छी सीरीज है, जरूर देखें ।

सीरीज का खलनायक शुभ नामक एक ब्राम्हण है जो बनारस का रहने वाला है । उसके पिता उसका जन्म कुछ ऐसे प्लान करना चाहते हैं जिससे वो शुभ मुहूर्त में पैदा हो और देवताओं की तरह गुण और ओज लेकर पैदा हो । पर समय को कौन बांध सका है, होनी को कुछ और मंजूर होता है, बालक निश्चित तिथि से दो दिन पूर्व, मां के साथ हुई एक दुर्घटना के कारण, जन्म ले लेता है । और ग्रह नक्षत्रों की स्थिति के अनुसार ये वो नक्षत्र स्थिति होती है जिसमें असुर का जन्म होता है । दुर्घटना में मां की मृत्यु हो जाती है जिसका दोष, पिता अपनी नवजात संतान को देता है और उसे असुर कह कर पुकारता है । बालक अपने दादा जी की छत्रछाया में और पिता की गालियों, नफरत के बीच बड़ा होता है । बालक का iq लेवल बहुत हाई, 139 होता है, जिसकी वजह से वो किसी भी किताब को मात्र देखने भर से याद कर लेता है । पिता से त्रस्त बालक एक दिन अपने तेज़ दिमाग का फायदा उठा कर पिता का ऐसे कत्ल करता है कि सब उसे दुर्घटना मान लेते हैं, सिवाए उस समय वहां हाजिर cbi अफसर धनंजय (अरशद वारसी) के । धनंजय, शुभ के भीतर छिपे होमिसिडल मैनियाक को पहचान लेता है और सबूतों में हेरफेर करके, बालक को 18 साल का बता कर, उसे जेल भिजवा देता है । 

यही बालक, जेल में आग लगा कर भाग जाता है, और करने लगता है परफेक्ट कत्ल, जिसका कोई सुराग cbi को नहीं मिलता । बातें बहुत सी हैं, मैं सब बता भी सकता हूँ, पर इससे आपका मजा जाता रहेगा, अभी ही मैंने कई राज खोल दिए हैं, जो सीरीज में धीरे-धीरे सामने आते हैं ।

सीरीज में कुछ विरोधाभास भी हैं, जैसे मैं पहले एपिसोड में ही जान गया था कि हत्यारा अकेला नहीं, कम से कम 2 लोग इन्वॉल्व हैं । यही बात हीरो अरशद वारसी को 5वें एपिसोड में समझ आती है, वो भी किसी और के सुझाए । ऐसी ही कुछ बातें हैं, जो मैं यहां नहीं लिखना चाहता, और कल मुझसे पूछेंगे तो शायद मैं भूल भी चुका होऊंगा । बहरहाल, सारे सवालों के जवाब देखने के लिए आप देखिए वूट की वेबसीरीज *असुर* 

हर पल तेरा

हर पल तेरा इंतजार है, मानो या न मानो, तुम्हें मुझसे प्यार है। दिन बदलते हैं, मौसम बदलते हैं, लेकिन जो न बदले, वो तेरा प्यार है। ऐ हसीन, गुल ...